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कालका-शिमला रेलवे लाइन से
संबधित जानकारी

1903-2003


     
कालका-शिमला रेलवे लाइन से जुड़ी जितनी भी कहानियां है उनमें से भल्कू की कहानी बहुत ही मोहक है, जिसने इस ट्रैक को बिछाने में अमूल्य योगदान दिया।  कहानी कुछ इस तरह है कि इस ट्रैक को बिछाने में उसके देवता दैती ने उसे राह दिखाई।  भल्कू अपनी छड़ी के साथ मार्ग बताते हुए पहाड़ों के ऊपर से चलते गए और इंजीनियर तथा वास्तुकार उनके पीछे इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए चले। एच.एस.हैरिंग्टन, तत्कालीन रेलवे एजेंट ने भी इसे स्वीकार किया है कि वह भल्कू की दिव्य शक्तियों से प्रभावित थे और हमेशा उनसे सलाह लेते थे। ऐसा माना जाता है कि वास्तव में भल्कू द्वारा सुझाए गए मार्ग पर ही कालका-शिमला रेलवे लाइन बिछाई गई। उनका योगदान उस समय की याद दिलाता है, जब 1850 में हिन्दुस्तान-तिब्बत सड़क निर्माणाधीन थी। (यह सड़क ग्रांड ट्रंक रोड के बाद निर्मित प्रथम राजमार्ग है जोकि अब 150 वर्ष से अधिक पुरानी है )

लगभग सौ वर्ष पूर्व, यह दुर्गम क्षेत्र जहां पर मामूली कृषि कार्य किया जाता था, में उस समय कुछ परिवर्तन आया जब स्टीम द्वारा चलने वाले पाइल ड्राइवरों,फावड़ों,सुरंग खोदने वाले उपकरणों सहित कर्मचारियों को देखा गया। कालका-शिमला रेलवे लाइन का निर्माण संसार के सबसे चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग कार्यों में से था क्योंकि जब यह पूर्ण होगा तो यह 96.54 कि.मी. पर्वतीय ट्रैक को कवर करेगा और कालका से 640 मीटर अति उष्णता से अधिक ठंड वाले क्षेत्र में स्वास्थ्यवर्ध्दक शिमला की ओर 2,060 मीटर की ऊंचाई तक जाएगा। प्रारंभिक तौर पर गेज को दो फीट के लिए सेट किया गया था और मिलिट्री की सिफारिश पर इसे हिल रेलवेज के मानकों के अनुरूप दो फुट छ: इंच किया गया। ट्रैक पर 33 में 1 का चढ़ता ढलान है ।

       दिल्ली गजट के संवाददाता द्वारा शिमला को रेल लिंक से जोड़ने का प्रस्ताव नवम्बर,1847 में प्रस्तुत किया गया जोकि भारतीय  उप महाद्वीप मुम्बई- थाने के मध्य प्रारंभ प्रथम रेलगाड़ी से भी 6 वर्ष पूर्व दिया गया था। इस पूर्वानुमान के दो दशक के भीतर शिमला को सरकारी तौर पर ब्रिटिश इंडिया की  ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया तथा इस क्षेत्र में टेलीग्राफ सुविधा पहुंचने के साथ गर्मियों के दौरान लगभग एक चौथाई आबादी इस छोटे शहर की तरफ रूख करने लगी। 19वीं शताब्दी के अंतिम दौर में इस लाइन का कार्य जब पूरी तरह से आरंभ हुआ, विश्व के इस क्षेत्र के साधन सम्पन्न लोगों के लिए रेल यात्रा का आकर्षण निरंतर बढ़ता गया । 

ईस्ट इंडिया रेलवे की दिल्ली -अंबाला-कालका लाइन को इस लाइन के यातायात से जोड़ने के लिए 9 नवम्बर,1903 को इस लाइन को खोला गया। बड़ी लाइन गाड़ियां कालका में समाप्त हो जाती है तथा फिर छोटे इंजन से चलने वाली खिलौना गाड़ियां 30 इंच गेज के इस ट्रैक पर आगे ले जाती है। मूल रूप से इस मार्ग पर 107 सुरंगे थी तथा 1930 में इनकी गणना 103 की गई क्योंकि इनमें से कुछ नष्ट हो गईं। आज इनकी संख्या 102 है परन्तु परम्परा निर्वाह के लिए 103 ही माना जाता है जोकि अपने मूल जीवन काल की है । इस लाइन पर 800 से अधिक पुल तथा 900 से अधिक कर्व है। यह लाइन मैदानी भाग से होकर हिमालय की निचली पहाड़ियों को 36 मीटर की गोलाई में रिवर्स कर्व पर चढ़ते हुए आगे जाती है।

सभवत: इस मार्ग में निर्मित सुरंगें व पुल लाइन को और अधिक महत्व देते है । सभी सुरंगें 1900 और 1903 के बीच बनी है और सबसे लम्बी सुरंग बड़ोग सुरंग है जोकि 1 कि.मी. से अधिक लम्बी है। वर्तमान सुरंग से 1 कि.मी. ऊपर बड़ोग सुरंग का मूल एलाइनमेंट किया गया था। पहाड़ी के दोनों ओर से सुरंग खोदने का काम शुरू किया गया। अत्यधिक प्रयास करने के बाद यह माना गया कि सुरंग के दोनों सिरे आपस में नही मिल पाएगे। इस विफलता के लिए इंजीनियर कर्नल एस. बड़ोग को 1 रूपये का जुर्माना किया गया। कार्य की असफलता से हतोत्साहित होकर उन्होंने अपने आपको गोली मार ली। इसके पश्चात इस स्थान एवं स्टेशन का नाम उनके नाम पर बड़ोग रखा गया। आज भी स्टेशन से ऊपर घने ओक एवं पाइन से घिरी इस सुरंग को देखा जा सकता है।

    ट्रैक के साथ पुल रोमन स्थापत्य कला को प्रदर्शित करते है और लम्बे आर्च पुलों की औसतन लम्बाई 2.8 कि.मी.है। पानी के झरने तराशे गए पत्थरो से सज्जित है तथा ऊंची दीवारों से लाइन को सुरक्षित किया गया है। इस लाइन का निर्माण एच.एस.हैरिंग्टन, मुख्य इंजीनियर एवं एजेंट कालका-शिमला रेलवे  के पर्यवेक्षण में एक प्राइवेट कंपनी द्वारा किया गया था। रेलवे को राज्य द्वारा 1906 में खरीदा गया था और इसकी उस समय निर्माण लागत 1,71,07,748 रूपये थी।   
        इस लाइन को बनाना जितना मंहगा था इसका अनुरक्षण भी उतना ही मंहगा। आज भी कालका-शिमला लाइन पर स्थित स्टेशनों के आकर्षक नाम कोटी, कनोह, सोलन तथा बड़ोग है।  टिनी कोचों के साथ टाँय ट्रेन कटी हुई झाड़ियों और तिरछी छतों के बीच से होकर गुजरती हैं। इस मार्ग में यात्रा करने का अपना ही सुखद अनुभव है और पर्वतीय क्षेत्र की इस यात्रा के प्रत्येक मोड़ पर एक नया अध्याय जुड़ता है। जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ती है, पार्श्व में इंजन की सीटी के साथ गाड़ी की आवाज गूंजती रहती है। 

यह लाइन भूरी पहाड़ियों, बांस, कैक्ट्स एवं उभरी हुए चट्टानों से होती हुई  अलपाइन के वृक्षों के बीच से गुजरती हुई हिमालय की तलहटी तक पहुंचती है। लाइन के साथ-साथ झाड़ियां तथा पाइन वृक्ष बीच-बीच में दिखाई पड़ते है। लम्बी यात्रा के दौरान मनोहारी दृश्य निरंतर दिखते रहते है, शिमला से पहले के कुछ किलोमीटर यह ओक और रोडोडेंड्रन के घने जंगलों से होकर गुजरती है।

आज जिनके पास यात्रा का कम समय होता है, उनके लिए शिमला आने- जाने का यह सबसे अच्छा रास्ता है। छोटी रेलकार आकर्षक है, जो यात्री आरामदायक यात्रा करना पसंद करते है उनके लिए शिवालिक एक्सप्रेस का निर्माण उसी ढंग से किया गया है और नियमित यात्री गाड़ियों में छोटे यात्री कूपे है। इस लाइन का इतिहास एवं यात्रा नये चरण में प्रवेश करने के लिए तैया र है,इससारेघटनाक्रमकोस्मरणीयबनानेकेलिएसमारोहआयोजनकीयोजनाब नईहै।ाईग

 

   कालका-शिमला खंड पर आकर्षण स्थ

स्थिति/स्टेशन

कि.मी. (कालका से)

संक्षिप्त विवरण

कालका
(656) मी.

0.00

हिमाचल प्रदेश का प्रवेश द्वारा मुख्यत: पारगमन तथा परिवहन उद्वेश्य से स्थापित किया गया। इसका नाम प्रसिद्व काली माता मंदिर के नाम पर पडा जो कि नगर के शिमला छोर पर अवस्थित है।

टकसाल

5.69

यह स्टेशन हिमाचल प्रदेश के औ्द्यौगिक नगर परवाणु में अवस्थित है।

गुम्मन

10.41

कसौली पहाडियों पर अवस्थित एक पृथक स्टेशन जहां पर जंगली जानवर भी विचरण करते रहते हैं।

कि.मी.

13

इस स्थान से प्रसिद्व टिम्बर ट्रैल रिसोर्ट दिखाई देता है। इस रिसोर्ट में दो पर्वत चोटियां केबल कार द्वारा जुडी है तथा केबल कारें 300 मी. गहरी घाटी को पार करती हैं।

कोटि

16.33

इस मार्ग पर कभी-कभी जंगली जानवर दिखाई देता है।

कोटि सुरंग

सुरंग नं 10

कालका-शिमला खंड की दूसरी सबसे लंबी सुरंग जिसकी लंबाई 693.72 मी है।

बिज नं. 226

27/10-2

कालका-शिमला खंड का सबसे लम्बा आर्क गैलरी पुल जिसकी लम्बाई 97.40 मी. तथा उॅचाई 19.31 मी है। इसे हैरिटेज स्ट्रक्चर घोषित किया गया है।

धर्मपुर हिमाचल

32.14

प्रसिद्व हिल स्टेश्न कसौली यहां से 13 कि.मी. दूर है तथा प्रसिद्व सनावर स्कूल भी पास में है।

संरक्षा शिविर

33 कि.मी.

यह कैम्प पूर्व ए.ई.एन. के बंगले तथा कार्यालय में अवस्थित है। बंगले को हॉस्टल तथा कार्यालय को क्लास रूम में बदल दिया गया है।

बड्ोग स्टेशन तथा सुरंग नं 33

42.14 कि.मी.

एल.डब्ल्यू.आर. ट्रैक के साथ खंड की सबसे लंबी सुरंग तथा (1143.61 मी.) सुरंग तथा स्टेशन का नाम इंजीनियर बडोग के नाम पर रखा गया जो कि प्रथम असफल सुरंग निर्माण का इंचार्ज था, क्योकि सुरंग के दोनों सिरे नहीं मिलते थे अत: वह पूरी नहीं की जा सकी। इंजीनियर पर 1/- जुर्माना किया गया परन्तु उसने स्वयं को अपमानित महसूस किया और खुद को तथा अपने कुते को गोली मार दी। असफल सुरंग के पास उसकी कब्र स्थापित है जो कि विद्यमान सुरंग से 1 कि.मी. की दूरी पर  है।

सोलन

46.10

जिला मुख्यालय तथा भारत के मशरूम शहर के नाम से प्रसिद्व है। यहॉ पर मशरूम उत्पादन का राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान है।

सलोगड्ा

52.70

यह पृथक स्टेशन स्काउट कैम्पस तथा रेलवे विश्रामगृहों के लिए प्रसिद्व है। जहां पर सुन्दर लॉन तथा मनोरम दृश्य उपलब्ध है।

कंडाघाट

58.24

प्रसिद्व हिल स्टेशन चैल यहां से 29 कि.मी. पर है।

कनोह

64.92

यह रेलवे स्टेशन एक घाटी में स्थित है तथा सड्क मार्ग से पूरी तरह कटा हुआ है। अपने समय में इंजीनियरी का उत्कृष्ट नमूना है। 23 मी. की उचाई तथा कवर्ड ले आउटस के साथ उच्चतम आर्क गैलरी ब्रिज (नं. 541)  भी यहां पर अवस्थित है।

तारा देवी

84.64

प्रसिद्व धार्मिक स्थल। इस स्टेशन के समीप तारादेवी तथा संकटमोचन मंदिर अवस्थित है। स्टेशन के शिमला छोर पर इस खंड की तीसरी सबसे लंबी सुरंग स्थित है।

समरहिल

92.93

इस स्टेशन के निकट प्रसिद्व हिमाचल विश्वविधालय अवस्थित है।

शिमला
(2075 मी.)

95.57

हिमाचल प्रदेश की राजधानी तथा विश्व प्रसिद्व हिल स्टेशन। ब्रिटिश साम्राज्य में यह भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी भी थी।

कालका से बडोग तक चढाई भरी यात्रा के बाद गाडी पहाडी ढलान पर चलने लगती है तथा सोलन तक मनोरम वादियों से गुजरती है और कंडाघाट से फिर चढाई शुरू होती हैं जो कि ओक के घने जंगलो से गुजरते हुए समरहिल की ओर बढती है। अंत में शिमला की वादियों में पहुंचती है जहां पर प्रकृति यात्रियों का स्वागत करने के लिए तैयार है।

शिमला पहुंंचने पर अप्रतिम सौन्दर्य से मन भावभिभूत हो उठता है और हरी-भरी घाटियाँ, घने जंगल तथा प्राकृतिक छटा मन को छू लेती है। शिमला, राज्य की राजधानी तथा पूर्व साम्राज्यवादी सरकार की ग्रीष्मकालीन राजधानी के प्राथमिक हिल रिजार्टस में से एक हेै। हिमाचल के सौंदर्य को यहां के निवासी अपनी सुन्दरता, सहिष्णुता तथा ईमानदारी से चार चांद लगाते हैं।

कालका शिमला खंड पर हेरिटेज स्ट्रकचर

ब्रिज नं 226, 493 तथा 541

ये आर्क गैलरी टाइप ब्रिज हैं। इन पुलों का मुख्य सौंदर्य प्रबंध विकास में है जिसके लिए टेपरिंग डीप वैली में बुद्विमानी के साथ स्लेन्ड्रैस समस्या से बचने के लिए पूरी उॅचाई को मंजिलो (टायर्स) में बांटा गया है। घाटी की चौडाई में अंतर को घाटी की बढती चौडाई के बढती उँचाई के अनुरूप आर्क (पाए) की संख्या बढाते हुए संभाला (कैटर) गया है। इस पुल की कुछ विशिष्टताएं निम्नानुसार है

ब्रिज नं.

टायरों की सं.

रेलवे स्टेशनों के मध्य

कुल लंबाई

निर्माण में प्रयुक्त सामग्री

226

4

सनवारा-धर्मपुर

69.5 मी.

चूने के साथ पत्थर

 

493

3

कंडाघाट-कनोह

32   मी

चूने के साथ पत्थर

541

4

कनोट के निकट

54.8 मी.

चूने के साथ पत्थर

शिमला रेलवे स्टेशन भवन

       शिमला एक गौरवशाली राज्य की गरिमामयी राजधानी है। यहां वर्ष भर छुट्टियां व्यतीत करने के लिए आने वाले सैलानियों की भीड़ को संभालना मुश्किल हो जाता है। शिमला स्टेशन भारत के पर्वतीय स्टेशनों की रानी है । यह समुद्र तल से 2076 मीटर (6820 फीट) की ऊंचाई पर पाइन एवं हरे-भरे एसफोडल पेड़ों के मध्य शांत स्थान पर स्थित है।  शिमला अभी भी अपनी पुरानी गरिमा को बनाए रखे हुए है।

       शिमला रेलवे स्टेशन के निर्माण के लिए ढलानों पर मेजर कैनेडी के प्रथम आवास के पास पहाड़ों के ढलानों पर एक स्थान को चुना गया।  जो पाइन, फर, हिमालयन ओक एवं करमिन तथा फूलदार झाड़ियों से घिरा था। इस छोटे लेकिन सुदंर स्टेशन भवन का निर्माण 1903 में तत्कालीन मुख्य इंजीनियर एवं कालका-शिमला रेलवे के एजेंट मि. एच.एस.हैरिंग्टन के पर्यवेक्षण में हुआ। स्टेशन भवन की दीवारें लकड़ी के फट्टों तथा छत ढलावदार जीआई सीट्स से बनी थीं।  इस भवन में सहायक स्टेशन मास्टर कार्यालय, प्रतीक्षालय तथा एक बुकिंग खिड़की उपलब्ध कराई गई थी।  1921 में एक नई दो मंजिला स्टेशन बिल्डिग बनाई गई जिसमें सहायक स्टेशन मास्टर कार्यालय, एआरएमई, प्रतीक्षालय, तार कार्यालय, छोटे-छोटे शेल्टरों वाले प्लेटफार्म बनाए गए। स्टेशन भवन के साथ ही रिक्शा शेड तथा होर्स स्टैण्ड उपलब्ध कराए गए थे।

       1944 में लगभग 12 फीट तक भारी हिमपात होने के कारण विद्यमान प्लेटफार्म शेल्टर ध्वस्त हो गया। स्टेशन भवन के नए शेड एवं प्लेटफार्म का निर्माण कालका-शिमला सेक्शन के तत्कालीन सहायक इंजीनियर स्व. मि. एम.डब्ल्यू.बोल्डविन के पर्ववेक्षण में किया गया। प्रथम तल पर बिजली एवं स्टेशन अधीक्षक कार्यालय, वेतन कार्यालय तथा 2 विश्रामगृह बनाए गए।  शिमला रेलवे स्टेशन को वर्ष 1986-87 में आधुनिक स्टेशन के रूप में विकसित करने के लिए चुना गया तथा प्लेटफार्म शेल्टर के विस्तार, पर्यटक सूचना कार्यालय, रेलवे टेलीफोन एक्सचेंज, नये विश्रमालय, बुकिंग आफिस का पुन:निर्माण तथा प्रथम तल से कैश आफिस के शिफ्टिंग के कार्य को वर्ष 1988-89 तथा 89-90 के दौरान पूरा किया गया। 
 
अब, इस सुंदर स्टेशन भवन के भूतल पर सुंदर एवं भव्य प्रतीक्षालय बनाया गया है, जहां पर पर्यटक बैठ कर हिमपात एवं बरसात के मोसम का आनंद ले सकते है। बुकिंग एवं आरक्षण कार्यालय, बुकिंग आफिस से स्टेशन प्लेटफार्म तक रैम्प द्वारा पूरी तरह कवर किया गया है। एक सिरे से दूसरे सिरे तक प्लेटफार्म शैल्टर, बढ़िया प्लेटफार्म तल और आधुनिक वाटर बूथ उपलब्ध कराए गए है तथा स्टेशन बिल्डिग के मूल ढांचे को उसके मूल स्वरूप मे ही रखा गया है। स्टेशन की दीवारें ईटों से बनी है तथा अंदर और बाहर दोनों तरफ चूना मिश्रण से प्लास्टर की गई है। स्टेशन भवन में 8 साधारण तथा 10 सुसज्जित डीलक्स विश्रमालय उपलब्ध है।
प्रत्येक कक्ष में बड़े आकार की खिड़कियां तथा वायु के आवागमन के लिए रोशनदान बने हैं। इनमें सामने से घाटी का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। इस सुंदर भवन का अग्रभाग दक्षिण की ओर है और यहां पर धूप आती रहती है।
      
शिमला स्टेशन भवन शानदार एवं सौन्दर्यपूर्ण हेै तथा संसार के अनेकों देशों से आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। वास्तव में यह भवन अद्वितीय धरोहर भवन के रूप में स्थान पाने की पात्रता रखता है।       

शिमला स्थित वुड बैंक  विश्रामगृह

बुड बैंक विश्रामगृह वर्ष 1920 में रेलवे के तत्कालीन इंजीनियरों द्वारा बनाया गया एक सुन्दर अधिकारी विश्रामगृह है। यह एक मंजिला भवन स्टेशन बिल्डिंग से 100 मीटर तथा कनेडी हाउस से  60 मीटर की दूरी पर  राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 22 एवं माल की चौडा मैदान वाली रोड के साथ भी जुडा हुआ है।
       इस विश्रामगृह को लकडी के स्लीपरों, बांस के लटठों, लकडी के शहतीरों की मदद से तथा ढ़लावदार छत को जीआई शीटों से बनाया गया है। इस विश्रामगृह में दो सूट हैं जिनमें ड्रांईग रूम, बैड रूम, साइड रूम तथा टॉयलेट एवं बाथरूम और किचन भी उपलब्ध है। इसका प्रत्येक सूट बहुत ही सुन्दर फर्नीचर, उच्च कोटि के कारपेट तथा अन्य मनमोहक वस्तुओं से सुसज्जित है। इनके किचन भी उच्च स्तर की क्राकरी तथा बर्तनों से सुसज्जित है। प्रत्येक कमरे में आग जलाने के लिए स्थान (फायर प्लेस) पर पीतल के हत्थे वाला चिमटा और कोयला रखने का छोटा बक्सा भी रखा हुआ है। ये सब  उस समय की बेजोड़   वस्तुएं हैं।

       प्राचीन लकडी का फर्नीचर अर्थात ड्रैसिंग टेबल, सैन्ट्रल टेबल, साइड टेवल तथा अलमारियां आदि सभी बहुत सुन्दर ढ़ंग से सज्जित है,जिनका उल्लेख विश्रामगृह में उपलब्ध विजिटर बुक में मिलता है। सुंदर नक्कासी के साथ ब्रास टावर बोल्ट, हैण्डिल हेस्प, स्टेपल तथा अन्य ब्रास फिटिंग उस समय की इजीयिरिंग कला की याद दिलाते हैं। विश्रामगृह के शौचालयों में एनडब्ल्यूआर के 1920 के लगाए गए चेहरा देखने वाले शीशे आज भी मौजूद है। सूट ए के मुख्य ड्राइंग रूम में 6 फुट ऊंचे ब्रास स्टैण्ड पर लगा एक आकर्षक ब्रास साइड लैम्प आज भी उपलब्ध है।

       फिलिप बोलकू, आर.एस.कवनदिश ओरिन जर्सी की उस अवधि की सुन्दर पेन्टिंग सूट ए के ड्राइंग रूम की सुन्दरता को बढाती हैं। इगलैंड की अयोट सन एण्ड कम्पनी की हल्के हरे रंग में पेन्ट की हुई पुरानी क्राकरी तथा उस युग की प्रशंसनीय बस्तुएं है।

सभी कमरों में हवा के आवागमन के लिए सुसज्जित लकड़ी की खिड़कियां लगी हुई है। सभी दरवाजों तथा खिडकियों की फिटिंग अर्थात लोअर बोल्ट,हैंडल तथा विशेष प्रकार के ब्रास के घुमावदार लाक लगे हैं जोकि अंग्रेजों के समय के हैं तथा आज भी सही प्रकार कार्य कर रहे है। सभी सूटों के बाथरूमों के फर्श पर पच्चीकारी की हुई है तथा दीवारों पर चमकीली टाइलें लगी है।

विश्रामगृह का अग्रभाग दक्षिण की ओर है। इस भाग में सुसज्जित खिड़कियां लगी है, जिनसे घाटी का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है। 

       ब्रिटिश काल में बना वुड बैंक विश्रामगृह बहुत ही सुंदर एवं वेहतरीन किस्म की लकडी से निर्मित विश्रामगृह है। वास्तव में यह विश्रामगृह अद्वितीय धरोहर भवन के रूप में स्थान पाने की पात्रता रखता है।

शिमला स्थित क्रो ब्रो अधिकारी विश्रामगृह

शिमला अति सुंदर पहाड़ी सैरगाहों में से एक है। इस सुंदर स्टेशन पर अधिकारी विश्रामगृह एवं अवकाश गृह पूरे भारतवर्ष से आने वाले रेलवे अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए स्वप्निल स्थल हैं।  इन विश्रामगृहों में क्रो ब्रो अधिकारी विश्रामगृह बहुत पुराना एवं आकर्षक दो मंजिला भवन है जिसका निर्माण रेलवे इंजीनियरों द्वारा 1921 में किया गया था। यह राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 22 पर स्थित है तथा स्टेशन भवन से इसकी दूरी मात्र 50 मीटर है। इसका प्रथम तल सीधा राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा है।  इस सुंदर भवन का निर्माण चूना मिश्रण व आकर्षक पत्थरों से किया गया है जिसकी ढलावदार छत चमकदार दस्ते से युक्त आयरन सीट से बनी है।  प्रथम तल की जैक आर्च छत पर सीसी की फ्लोरिंग की गई है।

इस विश्रामगृह में चार लग्जरी सूट है। प्रत्येक सूट में एक खुला शयनकक्ष, पार्श्व कक्ष तथा दो आकर्षक टायलेट, एक ड्राइंग कम डायनिंग रूम, पेन्टरी सहित किचन तथा एक आगुन्तक कक्ष है।  प्रत्येक किचन के लिए पीछे की ओर से सीढ़ियां है ताकि इसमें रहने वाले को कोई असुविधा न हो।  प्रत्येक सूट के बेडरूम तथा ड्राइंग रूम में आग जलाने के लिए स्थान (फायर प्लेस) उपलब्ध कराए गए है। कोयले के लिए एक ब्रास की नक्कासी वाली छोटी बिन रखी है। ब्रिटिश काल से ही प्रत्येक सूट में आग जलाने के लिए स्थान (फायर प्लेस) में प्रयोग के लिए ब्रास हेन्डिल की राड वाला एक चिमटा रखा हुआ है। यह कुछ प्राचीन अमूल्य धरोहर हैं जो इस सेक्शन पर उपलब्ध है।  प्रत्येक सूट पूरी तरह कारपेट से सुसज्जित किया गया है। सुंदर व आकर्षक फर्नीचर, डे्रसिंग टेबल तथा ब्रास कैरोसिन ऑयल लैम्प प्राचीनकालीन है जोकि इस रेस्ट हाउस के निर्माण काल से ही रखे गए है और अभी भी प्रयोग के लिए है।  वर्तमान में, इसमें सभी आधुनिक सुविधाएं जैसे- रंगीन टेलीविज़न, रेफ्रिजरेटर, रेलवे तथा डी ओ टी टेलीफोन उपलब्ध है। 
     
  सभी कमरों में वायु आवागमन के लिए पूरी तरह से सुसज्जित लकड़ी की खिड़कियां है।  सभी दरवाजों एवं खिड़कियों की फिटिंग अर्थात टावर बोल्ट, हेडिंल तथा ब्रास के ताले ब्रिटिश समय से ही उपलब्ध कराए गए है जिनका अब भी समुचित प्रयोग किया जा रहा है।  सभी सूटों के बाथरूमों के फर्श पर पच्चीकारी की हुई है तथा दीवारों पर चमकीली टाइलें लगी है। बिल्डिंग के अंदर उपलब्ध कराई गई सीढियां लकड़ी की बनी हुई हैं जिन पर लाल कारपेट बिछाई गई है तथा ब्रास एंगल स्ट्रीप्स से युक्त है। 
      
यहां उपलब्ध पुरानी क्राकरी जो इग्लैंंड की बनी हुई प्राचीनकाल की है जिस पर जे एंड जी का मार्क है तथा चम्मच एवं कांटे आदि ई.पी.एन.एस. कंपनी इग्लैण्ड द्वारा निर्मित हैं तथा अन्य बर्तन नट ब्राउन एवं इग्लैंड की अन्य कंपनियों द्वारा बनाए गए है, जो अभी भी उपलब्ध है तथा जिन्हें क्रो ब्रो रेस्ट हाउस में धरोहर क्राकरी के रूप में सुरक्षित रखा गया है ।

       विश्रामगृह का अग्रभाग दक्षिण की ओर है। इस भाग में सुसज्जित खिड़कियां लगी है, जिनसे घाटी का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है। 

     क्रो ब्रो विश्रामगृह 80 वर्ष पुराना है तथा इसके सूट आधुनिक सुविधा से युक्त एवं आरामदायक है। वास्तव में क्रो ब्रो विश्रामगृह बेहतरीन तरीके से रख रखाव किए गए शिमला के पुराने रेल भवनों में से एक है। 
शिमला तथा इसका वातावरण
       शिमला, उत्तर-पश्चिम हिमालय श्रृखलाओं में स्थित है जो कि स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी होती थी, अब हिमाचल प्रदेश की राजधानी है। इसने बीते समय की यादों को अभी तक संजो रखा है तथा देश भर से और विदेशों से भी लोक इसके अतीत को देखने तथा फर, ओक, पाइन एवं रोडोडेन्ड्रोन से घिरे और हरे-भरे सुन्दर ढलानों का नजारा देखने, की इसकी सुन्दरता का अनुभव करने आते हैं। शिमला नगर रिज पर लगभग 12 किमी क्षेत्र में फैला है। सेन्ट्रल क्रीसेंट शैप केल रिज के ऑफ शूटों (दूरस्थ क्षेत्रों)  में इसके उप नगर फेले हैं। शिमला शायद विश्व के बड्े हिल स्टेशनों में से एक है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि शिमला का नाम श्यामला से पडा जो कि भगवती काली का दूसरा नाम है, जिनका मंदिर 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जाखू हिल साइड के घने जंगलों में मिला था।
शिमला के बारे में सामान्य जानकारी

 

  • क्षेत्रफल            50.6 वर्ग कि.मी. (शहरी)
  • आबादी          1,42,000 (अनु./शहरी)
  • एल्टीडयूड    2205 मी.
  • मौसम      ग्रीष्म 28 सें अधि., शीत 0 डिग्री से.
  • सीजन      15 अप्रेैल से 30 जून, 15 सितम्बर से 15 जनवरी
  • भाषा       हिंदी, अंग्रेंजी, पहाडी, पंजाबी
  • पहनावा            सर्दियों में भारी ऊनी तथा गर्मियों में हल्के ऊनी

पहुॅचने के साधन

  • वायुमार्ग    निकटतम हवाई अड्डा शिमला से 32 कि.मी दूर

जुब्बार हट्टी।

  • रेल मार्ग    नैरो गेज रेलवे लाइन (96 कि.मी) द्वारा कालका से

जुड्ा है। कालका से बड्ी लाइन समूचे भारत को जोडती है।

  • सड्क मार्ग       शिमला सड्क मार्ग से दिल्ली (370 कि.मी.), चंडीगढ

(117 कि.मी.), कालका (96 कि.मी.) तथा पंजाब, हरियाणा व हिमाचल के अन्य शहरों से जुड्ा है।

शिमला तथा इसके आसपास प्रमुख आकर्षण स्थल

  • दी रिज         

नगर के मध्य में विशाल खुला मैदान जहां से पर्वत श्रृंखलाओं का मनोरम नजारा देखने को मिलता है।

  • दी माल         

शिमला का मुख्य शॉपिंग सेंटर ।

  • जाखू मंदिर (2455 मी) 2.5  कि.मी.    

शिमला की उच्चतम चोटी पर प्राचीन हनुमान मंदिर ।

  • इंडियल एडवांस स्टडीज इंस्टीटयूट (1983 मी) 4 कि.मी.     

प्राचीन वॉयसरीगल लॉज

  • संकटमोचन मंदिर (1975 मी) 7 कि.मी.

प्रसिद्व हनुमान मंदिर।

  • कुफरी (2510 मी.)16 कि.मी.

प्रसिद्व आइस स्केटिंग स्थल।

  • नालदेहरा (2044 मी) 22 कि.मी.       

नाइन हॉल गोल्फ कोर्स।

  • मशोबरा (2148 मी) 12 कि.मी

       घने जंगलो के लिए प्रसिद्व

  • चैल  (2226 मी) 43 कि.मी

महाराजा पटियाला की पूर्ण ग्रीष्म राजधानीा।

    
 

KALKA-SHIMLA RAIL        WORLD HERITAGE HILL RAILWAY

      The proposal of Kalka-Shimla Railway Line was prepared way back in November 1847. But it was only after opening broad gauge Railway Line from Delhi to Kalka on 3rd January 1891 that the construction of 95.57 Km long Railway Line from Kalka-Shimla began, some time towards the end of 19th century which was finally opened for traffic on 9th November 1903, during the Viceroyalty of Lord Curzon.

      The Kalka-Shimla Railway Line has 102 Tunnels built between the years 1900-1903, which about 8% total length. Large mirrors were used during construction of Tunnels for lighting. Interestingly these mirrors are still in use for maintenance proposes. Longest tunnel No.33 is named after Engineer Barog, who was In-Charge of construction of this tunnel.

      Steel girder bridges are very few on this Railway Line, as most of bridges are viaducts, multi arched galleries, which are great examples of Ancient Roman building art.

      In Guinness book of “Rail facts of feats” this Railway Line has been described as “The Greatest Narrow Gauge engineering feat in India”

SHIMLA RAILWAY STATION

      Shimla Railway Station, at an altitude at 2076 Meters (6811 feet) is heisted solemnly in the dense forests of Deodar and towering pine and green meads of Asphodel Hyacinth and celandine .A small but beautiful Station building was constructed in the year 1903 under the supervision of H.S. Harrington, the then Chief Engineer and representative of the Kalka Shimla Railway. In year 1921 a new double story station building with platform shelter was constructed. In the year 1944 due to heavy snow fall of about 12 feet, the existing platform shelter collapsed which was rebuilt under the supervision of M.W. Bouldwin, the then Assistant Engineer of Kalka Shimla Railway, based at Dharampur.

SHIMLA TOWN

      The town of Shimla came into existence when the “Gorkha War” came to an end in the year 1815-16 and the British decided to retain certain pockets at military outpost and sanitaria as holiday homes.
      The first house built in 1822 is regarded to be the Kennedy House. This was the residence of Captain Charles Prof. Kennedy, the newly appointed political officer to the hill station, In 1864, under the Viceroyalty of John Lawrence. Shimla was officially declared as the summer capital of British Empire in India - a status it retained up to India’s independence in 1947.
      Decision of Indo-Pak partition was taken in 1947 and history of Indo-Pak Shimla agreement was signed on 3rd July 1972 in Shimla.

Introduction

The Kalka-Shimla N.G. Section has been described by the Guinness Book of Rail Facts and Feats as the “ The greatest Narrow Gauge engineering in India”.  The 96.6 km long section was opened for traffic on November 9, 1903 having been constructed in record period of 3 years. Construction was preceded by 5 surveys.  This is an Engineering Feat of highest skill comprising of 102 tunnels aggregating 8 km, over 800 bridges including Roman Gallery, innumerable cutting with curves up to 48 degree, covering nearly 70% of the alignment in an amazingly short span of three years.
The 96.6 km hill section is amongst the most spectacular narrow gauge lines in the world.  The track spins like two silver threads through and across precipitous rail bridges, with beautiful kaleidoscopic nature skipping on either side.
The hill section runs through 102 tunnels (about 8% of route length) and 869 bridges (3% of route length) and 70%of the track is laid on curves as sharp as 48 degree.   It rises by 1420 meters between Kalka (656 m) and Shimla 2076 m) with an average gradient of 1 in 67.  The ruling gradient is 1 in 25.25

  1. Formation

Kalka-Shimla section is located in the highly erratic geological formation known as Shivalik system formed from the deposits derived from the erosion of rising Himalayas. The rocks consist of limestone with bands of shale and sand stone. The region has an annual rainfall of 200-250 cm with snowfall in winter.

  1. Alignment

Kalka-DharamPur-Kumar Hatti (0-38 km): On leaving Kalka (656m above MSL), the railway line enters the foothills, commencing its picturesque climb.  The section in the 12th km is 450 m below the summit and being highly prone to huge landslides, the alignment was burrowed under the hill through a tunnel near Koti station (16 km from Kalka) and is known as Koti tunnel (694 m long) located a height of 1098 m above mean seal level.
The alignment then continuously rises from Koti through Jabli (21 km), Sonwara (26 km) to touch the next main station Dharampur at an altitude of about 1480m, 32 km from Kalka. The gradient of the alignment in this reach is very steep and to achieve flatter gradients required by the railway, the line develops into three picturesque loops between Kalka and Dharampur near Taksal, Ghumman and Dharampur stations (respectively at distance of 6 km, 10 km and 32 km from Kalka).  Alignment then rises sharply from 1480 m at Dharampur to 1580m above sea level at Kumar Hatti 38 km from Kalka.
Kumar Hatti to Kandaghat: Falling Grade (38-58 km):  The alignment than falls to 1536m at Barog, 1450 m at Solan (46 km), Salogra (1500m) and to 1430 m at Kandaghat (58 km).  Between Kumar Hatti and Barog the line passes through the longest tunnel of the section called the Barog Tunnel which is 1144 m long and situated about 275 m below the road.
Kandaghat-Shimla: Rising grade (58-95 km):  The final ascent towards Shimla begins at Kandaghat 1430 m.  The line then gains on the road by taking short cuts and tunnels, passing through Kanoh (64 km) and Kathleeghat (71 km) so that the distance unto Taradevi (1936 m above MSL, 84 km from Kalka) by rail from Kalka is nearly 0.4 km less compared to road despite of railway handicap due to limiting grades and curvature.
From Taradevi the rail line goes under prospect hill to Jutogh at a height of 1950m winding in a series of a graceful curves around the Summer hill station (height 2043 m) and burrow under the Inver arm hill to emerge below the road on the south side of Shimla at a height of 2076 m.

Through out its length of 96 km the line runs in a continuous succession of reverse curves up to 48 degree along the valleys and spurs, flanking mountains, rising to 2076m above sea level at Shimla Railway Station, the steepest gradients being 25.25% in continuous stretches.

  1. Salient features on KLK-SML section.

1.

Track structure

Rails 60-R/75-R on ST sleepers, density (M+4)

2.

Length

96.6 km

3.

Gauge

2’-6” (762mm)

4.

Period of construction

1901-1903 (3 years)

5.

Date of commissioning

09.11.1903

6.

Ruling gradient

3% (1 in 25.25)

7.

Total curves

919

8.

Total length of curved track

67.68 km. (70%of the total)

9.

Maximum curvature

48 degree (R=37 m)

10.

Maximum super elevation

64 mm

11.

Maximum cant deficiency

75 mm

12.

Maximum permissible speed

Rail Cars         30 kmph
Trains               25 kmph
Turnouts           10 kmph

13.

Totals tunnels

102 (7.653 km i.e. 8%)

14.

Longest Tunnel

1143.61m (Barog)

15.

Total bridges

869 (3% of the line = 2.48 km)

16.

Longest bridges

67.77m (No. 220)

17.

Major Bridges

33 nos.

18.

Length of loop line

81.84 m (loco +7 coaches)

19.

Normal journey time

By bus            3 hrs 30 mts.
By taxi            2 hrs 30 mts.
By train           5 hrs 30 mts.
By rail car       4 hrs 10 mts.

20.

Total stations including Kalka & Shimla

19

21.

Geographical area.

 

 

Haryana (Distt. Panchkula)

Km 0.00 to 3/6-6

 

Himachal Pradesh (Distt. Solan)

Km 3/6-7 to 74/18

 

Himachal Pradesh (Distt. Shimla)

Km 74/18 to 96/11

BRIDGES:
There are 869 bridges in the section.  These bridges have almost lived 100 years and some of the bridges have been rehabilitated about a decayed back. There is no service span for using as relieving girder in case the bridges are rebuilt adopting temporary arrangement method. Moreover the alignment being in 48-degree curves will not permit movement of service span in a wagon.  Also, most of the bridges are not approachable by road and thereby transporting of the material required for upkeep of the bridges by road is not possible. Therefore, the schemes of rebuilding of bridges are to be judiciously finalised
 Most of the bridges are on multiple arches on deep valleys requiring regular and close attention during rains and snow. The detail of important multi tier arch bridges is summarised in the following table.

S.
No

Bridge No.

Km.

Between

Spans (m)

No. Of Tier

Type of const.

1

104

13/3-4

Gumman-Koti

2x3.35

2-Tier

Arch gallery

6x3.81

2

111

14/4-5

-Do-

1x3.35

3-Tier

Arch gallery

5x3.35

9x3.65

3

224

27/2-3

Sonwara-Dharampur

2x3.66

3-Tier

Arch gallery

8x2.59

2x1.22+3x3.35+
3x1.83

4

226

27/5-6

-Do-

2x3.35

4-Tier

Arch gallery

5x3.35

8x3.58+1x3.38

18x3.84

5

347

40/1-2

Dharampur-Kumarhatti

1x1.52

2-Tier

Arch gallery

3x3.28+4x3.35

6

512

61/8-9

Kandaghat-Kanoh

4x3.35+1x1.06

2-Tier

Arch gallery

6x3.66+1x1.53

7

541

64/7-8

Kandaghat-Kanoh

4x2.9+2x0.46

4-Tier

Arch gallery

2x2.74+3x2.9

5x3.05+2x2.89+3x0.75

10x3.8+3x1.29

8

641

75/0-1

Kathleeghat-Shogi

2x1.22+1x0.45

2-Tier

Arch gallery

7x1.28+1x1.22

9

756

88/0-1

Taradevi-Jutog

3x1.28+1x1.52+1x0.91

2-Tier

Arch gallery

1x1.52+6x3.65

10

787

91/2-3

Jutog-Summer hill

4x3.05+1x0.84

2-Tier

Arch gallery

6x3.66+1x1.52

11

827

94/9

Summer hill-Shimla

5x3.20

2-Tier

Arch gallery

5x3.20

 

  1. Hill slips

Heavy slips and major subsidence of track occurs due to following reasons:-

  1. Heavy rains causing steeper slopes of soil mass to slip.
  2. Erosion due to water oozing out of slopes.
  3. Disturbance to formations slopes of the railway alignment as a direct result of widening and repair of road formation located above or below the rail alignment

Last year a major exercise was done to identify locations prone to slips and the issue was taken up with local bodies and PWD for remedial action wherever construction activity was being taken up. 
PREVENTIVE MEASURES.
Provision and maintenance of properly lined side drains on the uphill side of the track to lead surface run off away from the effected slope. Side drains are lined to avoid percolation of water.

  1. Provision of catch water drains.
  2. Retaining walls after flattering of slopes.
  3. Removal of loose boulders before the rains to check their rolling down the slopes.

Snow fall: -

Snowfall normally occurs in the month of December and January. The average depth varies up to 2 feet to 6 to 7 feet in deep cuttings and shadow side of hills.  Removal of snow is done by manual cleaning and /or wedge shaped cutter fitted to the cowcatchers of the locomotives.

Monsoon patrolling
Monsoon patrolling is done by 1 or 2 persons per block section depending on vulnerability of the section. At vulnerable points, stationery patrollers are stationed during monsoon.

FACTS OF TUNNELS OF KSR SECTION

        The 96.54km long Kalka-Shimla narrow gauge track has 102 operational tunnels that constitute about 8 percent of the total length of the route. This rail track, which was open to passengers on November 9, 1903, is a living tribute to those Engineers who dared to bore a total of 107 tunnels and set as an example of how a railway line could pass through a rough mountainous terrain without destroying the splendor and beauty of the hills.

        The tunnels were renumbered in 1930, as some of them were found to be defunct. From 107, their number was reduced to 103, and this was further came down to 102 when tunnel no. 46 near the Solan Brewery had to be demolished.

        The two of longest tunnels on this track are at Barog and Tara Devi, All the tunnels were built between 1900 and 1903, L.Edwards, Executive Engineer of Dharam Pur Divisions completed work on as many as 30tunnels. Railway Chronicles say workers used large mirrors and acetylene gas to illuminate the tunnels. The longest tunnel on this track is the Barog tunnel (no.33). It is named after Barog, a British Railway Engineer. This 1143.61 meter-long tunnel, which passes through fissured sandstone, has a tragic story associated with its construction. Er.Barog, who was in charge of this tunnel, committed the mistake of digging from both ends of the hill. Both ends of the tunnel could not meet due to wrong alignment. It is said that the British Authorities fined Barog Re.1/- for wasting Government Money in the tunnel. The British Engineer could not digest this humiliation and during a walk along with his pet dog, shot himself in sheer desperation. He killed himself near what now is the State Government run Barog Pine Wood Hotel. It is said that his dog, upon seeing his master bleeding profusely ran in panic to a village near the present Barog railway Station, for help. However, by the time people reached the spot, Barog had breathed his last.
       
There are different versions about the suicide as some say the dejected Engineer shot his dog before he shot himself. He buried in front of the tunnel, near the Kalka-Shimla National Highway about 1 km from Barog. Ironically neither the Railway Authorities nor the State Government has done anything to maintain his grave. A signboard giving details about the said ends of Barog was put up near his grave but that too has now disappeared. As a result, It is now even difficult to locate the where about of his grave. The old tunnel has now been closed. The rejected tunnel has natural water source, meets the water demand of the special service. Bureau (SSB) Dharam Pur & Railway requirement/local residents.

       After the death of Er. Barog, Chief Engineer H.S. Erington was given the charge to dig a new tunnel. The new tunnel was constructed about 1 km away from the earlier point by the guidance of Bhalku local saint from Jhaja near Chail.

        Bhalku possessed natural engineering skills and is also believed that he also helped the British Engineers to bore other tunnels on the track. According to Sai Gazette the Vice Roy presented Bhalku a medal and a turban, which is still preserved by his family. as much as Rs 8.40 lacs incurred on the Barog tunnel. Work on it started on July 1900 and completed in Sep, 1903 Trains run at 25 km per hour to take 2.5 minutes to clear the tunnel.

 

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